
काबुल की रात कल सिर्फ अंधेरी नहीं थी… वह खून और धुएं से भरी थी. एक के बाद एक धमाके… और फिर सन्नाटा. ऐसा सन्नाटा जो कानों में नहीं, दिल में गूंजता है.
पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन गजब लिल हक’ के नाम से जो एयरस्ट्राइक की, उसने सिर्फ इमारतें नहीं गिराईं… उसने इंसानियत को झकझोर दिया.
सबसे बड़ा झटका तब लगा जब हमले की चपेट में एक अस्पताल आ गया. जहां इलाज होना था… वहां मौत की गिनती शुरू हो गई.
अस्पताल बना मलबा, सवाल बने लाशें
अफगान अधिकारियों के मुताबिक, इस हमले में 400 से ज्यादा लोगों की मौत और 250 से ज्यादा घायल हुए. ये आंकड़े नहीं हैं… ये वो कहानियां हैं जो अब कभी पूरी नहीं होंगी. पाकिस्तान का दावा है कि उसने सिर्फ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया.
लेकिन जब मलबे से स्ट्रेचर निकलें और बेड के साथ शव मिलें… तो कहानी बदल जाती है. यही वो जगह है जहां “सर्जिकल स्ट्राइक” और “मानवता” आमने-सामने खड़ी दिखती हैं.
‘अब बातचीत खत्म’: अफगानिस्तान का अल्टीमेटम
अफगान सरकार के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने साफ शब्दों में कहा है “अब कूटनीति खत्म… अब जवाब मिलेगा.” यह सिर्फ बयान नहीं… युद्ध की भूमिका है. अफगानिस्तान ने बदले की कसम खाई है. और इतिहास गवाह है, जब कसमों में गुस्सा मिल जाए… तो सीमाएं सिर्फ नक्शों में रह जाती हैं.
पाकिस्तान का दावा vs जमीनी हकीकत
पाकिस्तान इसे “आतंकवाद के खिलाफ जरूरी कार्रवाई” बता रहा है. उनका कहना है कि तालिबान ने पहले सीमा पार हमले किए, इसलिए जवाब देना जरूरी था. सवाल यह है कि जवाब कितना और किस पर? क्योंकि जब युद्ध का निशाना धुंधला हो जाता है…तो सबसे पहले निर्दोष लोग ही मरते हैं.

पलटवार शुरू: इस्लामाबाद से रावलपिंडी तक खतरा
तालिबान ने दावा किया है कि उन्होंने पाकिस्तान के कई अहम शहरों को निशाना बनाया. इस्लामाबाद, क्वेटा, रावलपिंडी… यहां तक कि नूर खान एयरबेस पर हमले की बात कही गई है. यानी अब लड़ाई सीमा तक सीमित नहीं रही. यह शहरों तक पहुंच चुकी है. और जब जंग शहरों में उतरती है…तो वह सिर्फ सैन्य नहीं, सामाजिक तबाही भी लाती है.
डूरंड लाइन: नक्शे की लाइन या बारूद की लकीर?
डूरंड लाइन पर हालात विस्फोटक हैं. दोनों तरफ से लगातार गोलाबारी. गांव खाली हो रहे हैं. लोग अपने ही घरों से शरणार्थी बन रहे हैं. यह वही सीमा है जो पहले सिर्फ विवाद थी…अब वही युद्ध का मैदान बन चुकी है.
असली खेल: शक्ति प्रदर्शन या नियंत्रण का संकट?
यह संघर्ष सिर्फ दो देशों के बीच नहीं है. यह नियंत्रण, बदला और दबाव की राजनीति का खतरनाक मिश्रण है. जहां हर हमला एक संदेश है…
और हर जवाब एक नया खतरा. विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अभी भी संयम नहीं बरता गया…तो यह टकराव पूरे दक्षिण एशिया को जकड़ सकता है.
जंग की आहट, इंसानियत की हार
काबुल की सड़कों पर अभी धूल बैठी भी नहीं है…और अगला हमला कब होगा, कोई नहीं जानता. जंग शुरू करना आसान है. लेकिन उसे रोकना… इतिहास में हमेशा मुश्किल रहा है. फिलहाल सवाल सिर्फ इतना है क्या यह बदले की आग रुकेगी… या पूरे क्षेत्र को जला देगी?
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